साठ के बाद एक नई दुकान, और फिर से विद्यार्थी बनने की जिद

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BridgeMind Store, BridgeMind Consulting की नई पहल, केवल एक रिटेल प्रयोग नहीं; यह बृजेश चन्द्र श्रीवास्तव की उस यात्रा का नया अध्याय है जिसमें इंजीनियरिंग, लेखन, ज्ञान और उद्यमिता को जोड़ने वाली एक चीज हमेशा जीवित रही है – जिज्ञासा।

साठ की उम्र पार करने के बाद बहुत-से लोग अपनी गति कुछ कम करना चाहते हैं। बृजेश चन्द्र श्रीवास्तव ने उल्टा रास्ता चुना – उन्होंने अपने लिए एक ऐसा क्षेत्र चुन लिया जिसमें वे फिर से विद्यार्थी थे।

नाम है BridgeMind Store – BridgeMind Consulting की नई डिजिटल रिटेल पहल।

त्योहारों के मौसम में जब बाजार नई खरीदारी, उपहारों और घर की जरूरतों से भरने लगता है, यह नया उद्यम भी ग्राहकों के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इसकी कहानी केवल बिक्री की कहानी नहीं है।

इसके पीछे 32 वर्ष RITES के साथ बिताकर महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त एक सिविल इंजीनियर, आईआईटी रुड़की के पूर्व छात्र, लेखक, मार्गदर्शक और दो राष्ट्रीय साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित बृजेश चन्द्र श्रीवास्तव हैं।

रेलवे, पुल, मेट्रो और बड़ी आधारभूत संरचना परियोजनाओं से किताबों तक पहुँचना एक स्वाभाविक विस्तार माना जा सकता है। लेकिन वहाँ से ऑनलाइन रिटेल में उतरना? यही वह मोड़ है जहाँ यह यात्रा सामान्य जीवन-वृत्त से अलग हो जाती है।

क्योंकि यहाँ असली प्रश्न दुकान का नहीं, मन का है:

क्या विशेषज्ञ बन जाने के बाद भी हम अपने भीतर इतना साहस बचाए रख सकते हैं कि किसी नए क्षेत्र में फिर से नौसिखिया बन सकें?

BridgeMind Store इसी साहस, जिज्ञासा और नई चुनौती स्वीकार करने की इच्छा का नवीनतम रूप है। और इस नए अध्याय को समझने के लिए कहानी को उस जगह लौटना होगा जहाँ सीखने की यह बेचैनी पहली बार दिखाई दी थी – एक गाँव, एक लालटेन और किताबों से भरा बचपन।

गाँव की लालटेन से आईआईटी रुड़की तक

1963 में बस्ती जिले के असनहरी गाँव में जन्मे बृजेश ने बहुत छोटी उम्र में माता-पिता दोनों को खो दिया। संसाधन सीमित होते गए, लेकिन पढ़ने की आदत बनी रही। गाँव के घर में लालटेन की रोशनी में रामायण के साथ पराग, चंपक, विज्ञान प्रगति, धर्मयुग और गीता प्रेस की पुस्तकें भी पढ़ी जाती थीं।

उनका विद्यालय में प्रवेश भी सामान्य नहीं था। पहली बार औपचारिक विद्यालय पहुँचे तो आयु और समझ देखकर सीधे कक्षा चार में प्रवेश दे दिया गया।

आगे की पढ़ाई उन्हें गोरखपुर ले गई। डीएवी इंटर कॉलेज में पढ़ाई के साथ घर के काम और खाना बनाने जैसी जिम्मेदारियाँ भी थीं। किताबें सहज उपलब्ध नहीं थीं। कभी पुराने कागजों के पीछे नोट्स लिखे गए, कभी आवश्यक पुस्तक खरीदने के लिए इंतजार करना पड़ा।

फिर रुड़की पहुँचे। तत्कालीन यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की, आज के आईआईटी रुड़की, से सिविल इंजीनियरिंग में बी.ई. और एम.ई. किया। यहीं इंजीनियरिंग के साथ मनोविज्ञान और मानव-व्यवहार में उनकी पुरानी रुचि और गहरी हुई। तब शायद उन्हें पता नहीं था कि लगभग चार दशक बाद इंजीनियरिंग और मनोविज्ञान की यही दो धाराएँ उनकी पुस्तकों में फिर मिलेंगी।

राइट्स के साथ 32 वर्ष, लेकिन असली डिग्री कार्यस्थल ने दी

एनआईडीसी में सहायक अभियंता के रूप में शुरुआती अनुभव के बाद अगस्त 1991 में उन्होंने राइट्स लिमिटेड में कार्यभार संभाला। मार्च 2023 में महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त होने तक 32 वर्ष राइट्स के साथ बीते।

रेलवे, पुल, औद्योगिक साइडिंग, विद्युत परियोजनाएँ, सार्वजनिक भवन, मेट्रो और जटिल आधारभूत संरचना परियोजनाएँ उनके कार्यक्षेत्र का हिस्सा रहीं।

कॉलेज आपको इंजीनियरिंग पढ़ाता है। कार्यस्थल आपको इंजीनियर बनाता है।

किसी स्वीकृत ड्रॉइंग पर प्रश्न उठाना हो, किसी नींव की डिजाइन की दोबारा तकनीकी समीक्षा करानी हो, परियोजना में निकली चट्टानों को बेकार मानने के बजाय रेलवे बैलास्ट में बदलकर लगभग ₹25 करोड़ की बचत का रास्ता निकालना हो, या वर्षों बाद किसी निर्णय को सही सिद्ध करने के लिए अभिलेख सुरक्षित रखना हो – उनके लिए इंजीनियरिंग धीरे-धीरे गणनाओं से आगे बढ़कर विवेकपूर्ण निर्णय लेने की कला बनती गई। शायद यहीं उनकी अगली यात्रा का बीज पड़ा।

जब अनुभव ने कहा – अब मुझे लिखो

सेवानिवृत्ति के बाद अक्सर व्यक्ति अपने अनुभवों को याद करता है। बृजेश श्रीवास्तव ने उन्हें लिखना शुरू किया।

उनके सामने एक सरल प्रश्न था। जब किसी बड़ी परियोजना के पूरा होने पर उसकी ड्रॉइंग, अभिलेख, परीक्षण परिणाम और नियमावली अगली पीढ़ी को सौंपे जाते हैं, तो चार दशकों का पेशेवर अनुभव बिना किसी ज्ञान-हस्तांतरण के क्यों समाप्त हो जाए?

यहीं से लेखन उनके लिए शौक नहीं, अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बन गया। 2026 में उनकी पुस्तकों की एक पूरी शृंखला सामने आई। विषय अलग-अलग थे, लेकिन भीतर छिपा प्रश्न लगभग एक ही था: जानकारी होना एक बात है; सही समय पर उसका सही उपयोग कर पाना दूसरी। इन दोनों के बीच की दूरी कैसे कम हो?

इसी सोच से निकली ‘Awareness to Mastery – The HCF of Every Great Exam’ ने प्रतियोगी परीक्षाओं को केवल पाठ्यक्रम का प्रश्न न मानकर ध्यान, जागरूकता और दबाव में प्रदर्शन की दृष्टि से देखा। इस पुस्तक को Legacy of Literature Awards 2026 में ‘Best Manuscript’ का सम्मान मिला।

दूसरी ओर, दशकों के आधारभूत संरचना अनुभव से निकली ‘The Document Fortress – A Practical Guide to Navigating India’s Public Works Projects’ ने इंजीनियरों और परियोजना-पेशेवरों के सामने अभिलेखों, अनुबंधों, उत्तरदायित्व और दस्तावेजी अनुशासन की उस दुनिया को रखा, जिसे इंजीनियरिंग की कक्षाओं में अपेक्षाकृत कम जगह मिलती है। इसे Legacy of Literature Awards 2026 में ‘Best Professional Non-Fiction’ का सम्मान मिला।

इसके बाद Beyond the Syllabus, The Mindful Engineer, The CSAT Playbook, Cracks in the Foundation और The Merchant’s Second Scale जैसी पुस्तकें इसी बौद्धिक यात्रा को अलग-अलग दिशाओं में आगे ले गईं। पुस्तकें यहाँ उत्पाद से अधिक अनुभव की अगली यात्रा बन गईं।

पुस्तक से आगे – ‘सेरेब्रल परस्यूट्स’

फिर प्रश्न उठा: अनुभव और ज्ञान केवल किताब के पन्नों तक सीमित क्यों रहें?

इसी विचार से Cerebral Pursuits को विस्तार मिला। यूट्यूब चैनल, शिक्षण ऐप, फेसबुक और ऑनलाइन समुदाय, पुस्तकें, मार्गदर्शन तथा शैक्षिक सामग्री – इन सबके माध्यम से एक ऐसा डिजिटल ज्ञान-तंत्र विकसित हुआ जिसमें इंजीनियरिंग की व्यावहारिक समझ से लेकर परीक्षा-मानसिकता और पेशेवर विकास तक अनेक विषय जुड़े।

रेलवे पेशेवरों के लिए विशाल तकनीकी दस्तावेजों को सरल व्याख्यात्मक वीडियो में बदलना हो या विद्यार्थियों के लिए रटने के स्थान पर अवधारणात्मक समझ को बढ़ावा देना, मूल विचार एक ही रहा: सीखना बंद नहीं होना चाहिए।

जुलाई 2026 में यही विचार दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित RailTrans Expo तक पहुँचा, जहाँ BridgeMind का Knowledge Pavilion स्थापित किया गया। रेलवे प्रदर्शनी में अधिकांश स्टॉल तकनीक, मशीनरी और उपकरण प्रदर्शित कर रहे थे। उनके बीच एक स्टॉल पुस्तकों, डिजिटल शिक्षा और पेशेवर ज्ञान की बात कर रहा था। उसके ऊपर एक छोटी-सी पंक्ति थी – ‘Knowledge Supersedes All’ – ज्ञान सर्वोपरि है।

और फिर कहानी ने अचानक मोड़ लिया

अब तक क्रम समझ में आता है: इंजीनियर से लेखक, लेखक से शिक्षक, शिक्षक से मार्गदर्शक। लेकिन अगला कदम? रिटेल!

जिस व्यक्ति ने अपना अधिकांश जीवन रेलवे परियोजनाओं, पुलों, अनुबंधों, इंजीनियरिंग निर्णयों और ज्ञान-वितरण में बिताया हो, वह साठ की उम्र पार करने के बाद ऑनलाइन खुदरा व्यापार में क्यों उतरे?

शायद इसी प्रश्न में इस यात्रा का सबसे रोचक हिस्सा छिपा है। आज BridgeMind Consulting के अंतर्गत तीन अलग-अलग प्रयास एक साथ आगे बढ़ रहे हैं: CONSULT – पेशेवर परामर्श; LEARN & SHARE – Cerebral Pursuits; और DISCOVER & SHOP – BridgeMind Store।

अनुभव → ज्ञान → समुदाय → उद्यम

BridgeMind Store: जब अनुभवी व्यक्ति ने फिर नौसिखिया बनना स्वीकार किया

BridgeMind Store इस यात्रा का सबसे नया प्रयोग है। यह BridgeMind Consulting की डिजिटल रिटेल पहल है और cerebralpursuits.in पर संचालित हो रही है।

इसका ढाँचा हल्का और आधुनिक रखा गया है। BridgeMind उत्पादों के चयन, प्रस्तुति, मूल्य निर्धारण, ग्राहक-संवाद और ब्रांड अनुभव पर ध्यान देता है, जबकि उत्पाद-स्रोत, भंडार और आपूर्ति की व्यवस्था सहयोगी तंत्र के माध्यम से होती है। अर्थात व्यापार में प्रवेश, लेकिन शुरुआत में विशाल गोदाम और भारी पूँजी के बोझ के बिना।

पर असली कहानी व्यापार के इस ढाँचे से भी अधिक दिलचस्प है। चार दशकों का अनुभवी इंजीनियर यहाँ फिर विद्यार्थी है। अब पढ़ाई के विषय हैं: ग्राहक की पसंद, उत्पाद-चयन, डिजिटल व्यापार, मूल्य निर्धारण, ऑनलाइन प्रस्तुति, आपूर्ति और ग्राहक-संतुष्टि।

युवा व्यक्ति नौसिखिया होता है क्योंकि उसके पास अनुभव नहीं होता। अनुभवी व्यक्ति जब अपनी इच्छा से फिर नौसिखिया बनता है, तो वह जिज्ञासा को चुनता है।

त्योहारों के मौसम में एक नई शुरुआत

भारत में त्योहार केवल उत्सव नहीं होते। वे रिश्तों, उपहारों, घर की जरूरतों और खरीदारी का भी मौसम होते हैं। कपड़े हों, फैशन और उपयोगी सामान, बैग हों, घरेलू वस्तुएँ हों, उपहार हों या रोजमर्रा की जरूरतें – परिवार इस समय नए विकल्प तलाशते हैं।

ऐसे ही आगामी त्योहारी मौसम में BridgeMind Store भी अपनी नई यात्रा आगे बढ़ा रहा है। लेकिन उसका आग्रह विशाल दावों पर नहीं, एक सरल विचार पर है:

Thoughtfully Curated. Simply Delivered.

सोच-समझकर चुना गया। सरलता से आपके घर तक।

अनंत विकल्पों की भीड़ खड़ी करने के बजाय उपयोगी वस्तुओं का चयन, ऑनलाइन खरीदारी की सुविधा और ग्राहक तक सरल आपूर्ति। और लगता है कि संस्थापक की इंजीनियरिंग यहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ रही!

इंजीनियरिंग में पहले आवश्यकता समझी जाती है, फिर specification, फिर selection। BridgeMind Store में भी बात लगभग वही है: पहले जरूरत समझिए। फिर विकल्प देखिए। फिर कीमत देखिए। और पसंद आए तो ऑर्डर कर दीजिए।

बस यहाँ ड्रॉइंग की जगह Shopping Cart है!

आखिर इस कहानी की सबसे बड़ी पूँजी क्या है?

बृजेश श्रीवास्तव की यात्रा को केवल एक सफल इंजीनियर की कहानी कहना अधूरा होगा। उन्हें केवल लेखक कहना भी कम होगा। और BridgeMind Store को केवल एक नई ऑनलाइन दुकान मान लेना शायद कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात को छोड़ देना होगा।

इस यात्रा की सबसे बड़ी पूँजी शायद पद, पुरस्कार, पुस्तकें या व्यापार नहीं है। वह है जिज्ञासा।

वही जिज्ञासा जो गाँव में लालटेन के नीचे किताब पढ़ रही थी। वही जो रुड़की में इंजीनियरिंग के साथ मनोविज्ञान समझ रही थी। वही जो परियोजना स्थल पर स्वीकृत ड्रॉइंग से भी सवाल पूछ रही थी। वही जिसने सेवानिवृत्ति के बाद किताबें लिखीं। वही जिसने यूट्यूब, ऐप और डिजिटल शिक्षा की दुनिया सीखी। और वही अब ऑनलाइन खुदरा व्यापार समझ रही है।

उम्र के साथ अनुभव बढ़ता है। लेकिन अनुभव के साथ एक खतरा भी बढ़ सकता है: हमें लगने लगता है कि अब सीखने के लिए बहुत कम बचा है।

विशेषज्ञ बनना उपलब्धि है। विशेषज्ञ बनने के बाद भी फिर से विद्यार्थी बनने का साहस बनाए रखना शायद उससे बड़ी उपलब्धि है।

आज BridgeMind Consulting पेशेवर परामर्श देता है। Cerebral Pursuits ज्ञान बाँटता है। उनकी पुस्तकें दशकों के अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुँचाती हैं। और BridgeMind Store उद्यमिता की एक बिल्कुल नई दिशा तलाश रहा है।

कल इसमें कौन-सा नया अध्याय जुड़ जाए, शायद स्वयं बृजेश श्रीवास्तव भी आज ठीक-ठीक न बता पाएँ। और शायद यही इस कहानी की सबसे अच्छी बात है।

क्योंकि कुछ यात्राओं की खूबसूरती इस बात में नहीं होती कि मंजिल पहले से मालूम है, बल्कि इस बात में होती है कि यात्री ने चलना बंद नहीं किया है।

जिज्ञासा की कोई सेवानिवृत्ति-तिथि नहीं होती।

और शायद जीवन की दूसरी पारी की सबसे अच्छी कार्ययोजना भी यही है।


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