गुरुग्राम: आज के समय में जब बाजार बड़े-बड़े कारखानों और मशीनों से बने उत्पादों से भरा हुआ है, वहीं ग्रामीण चटोर एक ऐसा ब्रांड बनकर उभरा है जो स्वाद के साथ-साथ संस्कृति, आत्मसम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी को भी साथ लेकर चल रहा है।
राजेश गुप्ता द्वारा स्थापित यह ब्रांड मिथिला की पारंपरिक खाद्य विरासत को पूरे भारत के घरों तक पहुँचा रहा है, और साथ ही ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहा है।
मिथिला की परंपरा से जुड़ा एक सशक्त विचार
ग्रामीण चटोर की शुरुआत एक सरल लेकिन गहरे उद्देश्य से हुई—ऐसे पारंपरिक स्वादों को बचाना, जो समय के साथ गुम होते जा रहे हैं। मिथिला क्षेत्र की पारंपरिक रेसिपी, शुद्ध सामग्री और पारिवारिक तरीकों से बने उत्पाद आज ग्रामीण चटोर की पहचान बन चुके हैं।
यह ब्रांड केवल खाने-पीने का सामान नहीं बेचता, बल्कि हर उत्पाद के साथ एक कहानी लेकर आता है—परंपरा, शुद्धता और विश्वास की कहानी।
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महिलाएँ जो चला रही हैं घर, और बना रही हैं ब्रांड
ग्रामीण चटोर की असली ताकत वे 25 से अधिक स्थानीय महिलाएँ हैं, जो इस ब्रांड के साथ काम कर रही हैं। इनमें से कई महिलाएँ पहले केवल घरेलू काम तक सीमित थीं या अस्थायी आय पर निर्भर थीं। आज ग्रामीण चटोर उनके लिए स्थायी रोज़गार का साधन बन चुका है।
इन महिलाओं की कमाई से घर का राशन चलता है, बच्चों की पढ़ाई होती है, और परिवारों में आर्थिक स्थिरता आई है। कई परिवारों के लिए यह आय सिर्फ अतिरिक्त नहीं, बल्कि घर चलाने का मुख्य साधन है।
राजेश गुप्ता का मानना है कि जब महिलाएँ सशक्त होती हैं, तो पूरा परिवार और समाज मजबूत होता है।
रोज़गार से बढ़कर आत्मसम्मान
ग्रामीण चटोर में काम करने वाली महिलाओं को न केवल रोज़गार दिया जाता है, बल्कि उन्हें प्रशिक्षण, सम्मान और जिम्मेदारी भी मिलती है। वे उत्पादों की गुणवत्ता, स्वच्छता और पारंपरिक तरीकों को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं।
आने वाले समय में कंपनी का लक्ष्य 100 से अधिक महिलाओं को रोज़गार देना है, ताकि बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके और ज्यादा से ज्यादा परिवारों तक यह बदलाव पहुँच सके।
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एक व्यवसाय जो समाज के लिए भी खड़ा है
ग्रामीण चटोर सिर्फ एक फूड ब्रांड नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक बदलाव की एक पहल है। परंपरा और आधुनिक वितरण प्रणाली के संतुलन के साथ यह ब्रांड उपभोक्ताओं के बीच भरोसे का नाम बनता जा रहा है।
इस बारे में बात करते हुए संस्थापक राजेश गुप्ता कहते हैं,
“ग्रामीण चटोर सिर्फ स्वाद की बात नहीं करता, यह सम्मान, अवसर और संस्कृति की बात करता है। हमारे हर उत्पाद के पीछे उन महिलाओं की मेहनत है, जिनके घर आज आत्मनिर्भर हो रहे हैं।”
निष्कर्ष
तेज़ी से बढ़ती पहचान के साथ, ग्रामीण चटोर यह साबित कर रहा है कि जब व्यवसाय की नींव सच्चाई और सशक्तिकरण पर रखी जाए, तो वह केवल मुनाफा नहीं कमाता—वह समाज को प्रेरित करता है।
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